ढलती हुई शाम

 शाम 6 बजे थे। मै अपनी छत पे बेठी आकाश को निहार रही थी .............काफी बारिश हुई थी दिन में ...आज का आसमान का नज़ारा कुछ और ही है  ..... बादलों ने आकाश का श्रृंगार कर दिया है .....और बादलों के पीछे ढलते सूरज की लालिमा एक अलग ही नज़ारा पेश कर रही है .....
कभी कभी लगता है  जैसे मेरा मन ........इन बादलों की  है  .....जब तक मन में विचार रूपी जल भरा रहेगा ....तब तक उसकी गति बहुत कम होगी  .......मन भारी होगा , ठीक जल लिए बादलों की तरह , कालिमामयी ..
 जब बदल बरस  है, तो वो और भी ज्यादा उज्जवल ,....ख़ूबसूरत ... हुए कपास की भांति प्रतीत होता है ......
उन खाली बादलों की और देखने पे लगता है  जैसे वाही स्वर्ग है ......उनके पीछे जैसे कोई और दुनिया है ..
और उसकी दूसरी और उगता हुआ चन्द्रमा ....और बादलों के पीछे डूबता हुआ सूरज  ...एक अनोखा संगम ...संगम अँधेरे और उजाले का ....एक शीतल वातावरण .......ऐसे लुभावने संगम में मन एक पंछी की भांति 
उन्मुक्त गगन में उड़ने लगता है ..........ये वक़्त का खेल ही है .....जिस सूरज को देखने से अन्धकार सा छा जाता था वाही सूरज ढलते वक़्त आँखों को   देता है ....वाकई में ढलती हुई चीज़ शीतल हो जाती है .....उसका   हो जाता है ....ढलते हुए इंसान का मन भी स्थिर होने लगता है .....
भगवन ने भी कितने अजीब नियम बनाये है ............... 

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