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Showing posts with the label प्यार

वो छोटी सी वजह हो मेरे जीने की...

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कुछ जवाबों का हमें ता उम्र इंतज़ार रहता है...खास तौर से उन जवाबों का जिनके सवाल हमने कभी पूछे नहीं, पर सवाल मौजूद जरूर थे...और बड़ी बेचारगी से अपने पूछे जाने की अर्जी लिए घूमते थे...और हम उससे भी ज्यादा बेदर्द होकर उनकी अर्जियों की तरफ़ देखते तक नहीं थे... जिसे नफरत तोड़ नहीं सकती...उपेक्षा तोड़ देती है, नफरत में एक अजीब सा सुकून है, कहीं बहुत गहरे जुड़े होने का अहसास है, नफरत में लगभग प्यार जितना ही अपनापन होता है, बस देखने वाले के नज़रिए का फर्क होता है... कुछ ऐसे जख्म होते हैं जिनका दर्द जिंदगी का हिस्सा बन जाता है...बेहद नुकीला, हर वक्त चुभता हुआ, ये दर्द जीने का अंदाज ही बदल देता है...एक दिन अचानक से ये दर्द ख़त्म हो जाए तो हम शायद सोचेंगे कि हम जो हैं उसमें इस दर्द का कितना बड़ा हिस्सा है...जिन रास्तों पर चल के हम आज किसी भी मोड़ पर रुके हैं, उसमें कितना कुछ इस दर्द के कारण है...इस दर्द के ठहराव के कारण कितने लोग आगे बढ़ गए...हमारी रफ़्तार से साथ बस वो चले जो हमारे अपने थे...इस दर्द में शरीक नहीं...पर उस राह के हमसफ़र जिसे इस दर्द ने हमारे लिए चुना था। मर जाने के लिए एक वजह ह...

आइस क्यूब्स

ये झूठ है कि किसी से बिछड़ता है कोई हम बस, मर जाते हैं --------------------------- एयरटेल कहता है हमारी दुनिया में आप कभी अपनों से कभी जुदा नहीं होते ऐसा वादा खुदा क्यूँ नहीं करता कभी? ---------------------- कहीं से आती कोई हवाएं नहीं बता पाती हैं कि तुम्हारे काँधे से कैसी खुशबू आती है? -------------------- किसी भी पहर तुम्हारी आवाज़ नहीं भर सकती है  मुझे अपनी बांहों में!  ------------------------ मैं वाकई नहीं सोचती  लिप बाम लगाते हुए कि तुम्हारे होटों का स्वाद कैसा है! ---------------------------- मुझे कभी मत बताना कितनी आइस क्यूब डालते हो तुम अपनी विस्की में ----------------------------- कच्ची डाली से मत तोड़ा करो मेरी नींदें इनपर ख्वाब का फूल नहीं खिलता फिर ----------------------------- बातों का कैसे ऐतबार कर लूं तुम न कहते हो मुझसे झूठ झूठ  'आई लव यू'. --------------------------- सच कहती हैं सिर्फ उँगलियाँ जो तुम्हारा फ़ोन कॉल पिक करते हु...

उसने लिखा फरेब तो मैंने वफा लिखा

उसने लिखा फरेब तो मैंने वफा लिखा पूरे सफे पे एक नहीं, सौ दफा लिखा मेरे कसूर का पता खुद ही मुझे नहीं उसने ही बार बार कलम से खफा लिखा ... मैंने भी रंज सारा झटके में रख दिया बरसों की मोहब्बत का है ये तोहफा लिखा उसने लिखा नुकसान के रिश्ते का सब सबब रिश्ते के इस हिसाब में मैंने नफा लिखा रखी नहीं कसर कुछ पर वो नहीं माना फिर मैंने भी आखिर में सब कुछ रफा लिखा...

उस लड़की में दो नदियां रहती थीं

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मेरे अन्दर दो बारामासी नदियाँ बहती हैं. दोनों को एक दूसरे से मतलब नहीं...अपनी अपनी रफ़्तार, अपना रास्ता...आँखें इन दोनों पर बाँध बनाये रखती हैं पर हर कुछ दिन में इन दोनों में से किसी एक में बाढ़ आ जाती है और मुझे बहा लेती है. एक नदी है ख़ुशी की...जब इस नदी में बाढ़ आती है तो दुनिया में कुछ भी हो जाए मैं उदास नहीं हो सकती. किसी की तकलीफ, दुःख, परेशानी का हल ढूंढ लेती हूँ. हर वक़्त मुस्कुराती रहती हूँ...कभी कभी तो ऐसा भी हुआ है कि पूरी शाम मुस्कुराने के कारण गालों में दर्द उठ गया हो...मैं उस वक़्त आसमान की ओर आँखें करती हूँ और उस उपरवाले से पूछती हूँ 'व्हाट हैव यु डन टु मी?' मैं शाम से पागलों की तरह खुश हूँ...अगर कोई बड़ा ग़म मेरी तरफ अब तुरंत में फेंका न तो देख लेना...ऐसे मूड में मैं भगवान से मसखरी करती हूँ. चिढ़ाती हूँ...दुनिया को भी बड़ी आसानी से माफ़ कर देती हूँ. लोग मेरा दिल दुखाते हैं तो उन्हें समझने की कोशिश करती हूँ कि शायद उनकी जिंदगी में कुछ बुरा चल रहा हो. ख़ुशी की नदी का पानी साफ़ है और एकदम मीठा है...इसे मैं कभी कभी बोतल में भर कर अपने दोस्तों को भी भेजती रहती...

प्यार की ये चिट्ठी तुम्हारे नाम

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बहुत कुछ है जो तुमसे कहने का दिल हो रहा है... क्या ये नहीं मालूम... पर कुछ तो है... कितने ही शब्द लिखे मिटाये सुबह से... कोई भी वो एहसास बयां नहीं कर पा रहा जो मैं कहना चाहती हूँ... गोया सारे अल्फ़ाज़ गूंगे हो गए हैं आज... बेमानी... तुम सुन पा रहे हो क्या वो सब जो मैं कहना चाहती हूँ ? ऐसी ही किसी तारीख़ को ऐसे ही किसी प्यारे दिन की याद में ये लिखा था कभी... तुम्हारे लिए... आज भेज ही देती हूँ प्यार की ये चिट्ठी तुम्हारे नाम... *एक दूजे को देख कर जब मुस्कुरायीं थी आँखें पहली बार लम्हें का इक क़तरा थम गया था ! वो ख़ुशनुमा क़तरा आज भी बसा है ज़हन में वो पहली बार जब थामा था तुम्हारा हाथ मेरी उँगलियों ने बींध लिया था तुम्हारी उँगलियों का लम्स भी वो लम्स अब भी महकता है मेरे हाथों में उस आधे चाँद की मद्धम चाँदनी उम्मीद के कच्चे दिए की लौ सी टिमटिमाती हुई आज भी आबाद है दिल के अँधेरे कोने में कहीं सागर की उन बांवरी लहरों ने बाँध के मेरे पैरों को रोका हुआ है वहीं हमारे पैरों के निशां संजो रखे हैं साहिल की गीली रेत ने अब तलक जी करता है ठ...