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वो छोटी सी वजह हो मेरे जीने की...

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कुछ जवाबों का हमें ता उम्र इंतज़ार रहता है...खास तौर से उन जवाबों का जिनके सवाल हमने कभी पूछे नहीं, पर सवाल मौजूद जरूर थे...और बड़ी बेचारगी से अपने पूछे जाने की अर्जी लिए घूमते थे...और हम उससे भी ज्यादा बेदर्द होकर उनकी अर्जियों की तरफ़ देखते तक नहीं थे... जिसे नफरत तोड़ नहीं सकती...उपेक्षा तोड़ देती है, नफरत में एक अजीब सा सुकून है, कहीं बहुत गहरे जुड़े होने का अहसास है, नफरत में लगभग प्यार जितना ही अपनापन होता है, बस देखने वाले के नज़रिए का फर्क होता है... कुछ ऐसे जख्म होते हैं जिनका दर्द जिंदगी का हिस्सा बन जाता है...बेहद नुकीला, हर वक्त चुभता हुआ, ये दर्द जीने का अंदाज ही बदल देता है...एक दिन अचानक से ये दर्द ख़त्म हो जाए तो हम शायद सोचेंगे कि हम जो हैं उसमें इस दर्द का कितना बड़ा हिस्सा है...जिन रास्तों पर चल के हम आज किसी भी मोड़ पर रुके हैं, उसमें कितना कुछ इस दर्द के कारण है...इस दर्द के ठहराव के कारण कितने लोग आगे बढ़ गए...हमारी रफ़्तार से साथ बस वो चले जो हमारे अपने थे...इस दर्द में शरीक नहीं...पर उस राह के हमसफ़र जिसे इस दर्द ने हमारे लिए चुना था। मर जाने के लिए एक वजह ह...

सवालों का बरछत्ता

 मैं हवा में गुम होती जा रही हूँ, उसे नहीं दिखता...उसके सामने मेरी आँखों  का रंग फीका पड़ता जाता है, उसे नहीं दिखता...मैं छूटती जा रही हूँ कहीं, उसे नहीं दिखता... --- मैं गुज़रती हूँ हर घड़ी किसी अग्निपरीक्षा से...मेरा मन ही मुझे खाक करता जाता है। यूँ हार मानने की आदत  तो कभी नहीं रही। कैसी थकान है, सब कुछ हार जाने जैसी...कुरुक्षेत्र में कुन्ती के विलाप जैसी...न कह पाने की विवशता...न खुद को बदल पाने का हौसला, जिन्दगी आखिर किस शय का नाम है? कर्ण को मिले शाप जैसी, ऐन वक्त पर भूले हुये ब्रम्हास्त्र जैसी...क्या खो गया है आखिर कि तलाश में इतना भटक रही हूँ...क्या चाहिये आखिर? ये उम्र तो सवाल पूछने की नहीं रही...मेरे पास कुछ तो जवाब होने चाहिये जिन्दगी के...धोखा सा लगता है...जैसे तीर धँसा हो कोई...आखिर  जिये जाने का सबब कुछ तो हो! --- क्या चाहिये होता है खुश रहने के लिये? कौन सा बैंक होता है जहाँ सारी खुशियों का डिपॉजिट होता है? मेरे अकाउंट में कुछ लोग पेन्डिंग पड़े हैं। उनका क्या करूँ समझ नहीं आता ...अरसा पहले उनके बिना जिन्दगी अधूरी थी...अरसा बा...

जाने का कोई सही वक्त नहीं होता

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आने का वक्त होता है। होना भी चाहिये। हिरोईन जब उम्मीदों से क्षितिज को देख रही हो...या कि छज्जे से एकदम गिरने वाली हो...या कि म्युजिक डायरेक्टर ने बड़ी मेहनत से आपका इन्ट्रो पीस लिखा है...तमीज कहती है कि आपको ठीक उसी वक्त आना चाहिये म्युजिक फेड इन हो रहा हो...जिन्दगी में कुछ पुण्य किये हों तो हो सकता है आप जब क्लास में एन्ट्री मारें तो गुरुदत्त खुद मौजूद हों और जानलेवा अंदाज में कहें...'जब हम रुकें तो साथ रुके शाम-ए-बेकसी, जब तुम रुको, बहार रुके, चाँदनी भी'...सिग्नेचर ट्यून बजे...और आपको इससे क्या मतलब है कि किसी का दिल टुकड़े टुकड़े हुआ जाता है...आने का वक्त होता है...सही... मगर जाने का कोई सही वक्त नहीं होता। कभी कभी आप दुनिया को बस इक आखिरी प्रेमपत्र लिख कर विदा कह देना चाहते हैं। बस। कोई गुडबाय नहीं। यूं कि आई तो एनीवे आलवेज हेट गुडबाइज...ना ना गुड बौय्ज नहीं कि कहाँ मिलते है वैसे भी...मिलिट्री युनिफौर्म में ड्रेस्ड छोरे कि देख कर दिल डोला डोला जाये और ठहरने की जिद पकड़ ले। भूरी आँखें...हीरो हौंडा करिज्मा...उफ़्फ टाईप्स। बहरहाल...सुबह के छह बजे नींद खुल जाये, आसमान ...

आखिरी मुलाकात

कुछ गीत ऐसे होते हैं कि सुनकर जैसे दिल में कोई हूक सी उठने लगती रहती है। बरसों पुराने कुछ बिछडे लोग याद आने लगते हैं, कुछ जख्म फ़िर से हरे हो जाते हैं। कुछ ऐसा ही है बाज़ार का ये गाना "देख लो आज हमको जी भर के"। हालात, वक्त और बिछड़ने का अंदाज़ जुदा होने के बावजूद सुनते ही कोई पहचानी गली याद आ जाती है, गीली आँखें याद आती हैं, और एक शहर जैसे जेहन में साँसे लेने लगता है फ़िर से। इश्क होता ही ऐसा है, गुज़र कर भी नहीं गुज़रता, वहीँ खड़ा रहता है। जब कोई ऐसा गीत, कोई ग़ज़ल पढने को मिलती है तो जैसे एक पल में मन वहीँ पहुँच जाता है। जहाँ जाना तो था पर लौट कर आना नहीं था। वो आखिरी कुछ लम्हे जब वक्त को रोक लेने कि ख्वाहिश होती है, किसी को आखिरी लम्हे तक ख़ुद से दूर जाते देखना, अपनी मजबूरियां जानते हुए, ये जानते हुए कि वो हँसते खिलखिलाते पल अब कभी नहीं आयेंगे। वो आखरी मुलाकात...कुछ ऐसी बातें जो कही नहीं जा सकीं, एक खामोशी, एक अचानक से आई हुयी दूरी...और वही कम्बक्त वक्त को रोक लेने कि ख्वाहिश। पूजा 

मैं और तुम

मेरे तुम्हारे बीच उग आया है कंटीला मौन का जंगल जाने कब खो गयीं शब्दों की राहें खिलखिलाहटों की पगडंडियाँ ऊपर नज़र आता है स्याह अँधेरा नहीं दिखता है चाँद नहीं दिखती तारों सी तुम्हारी आँखें काँटों में उलझ जाता है तुम्हारा स्पर्श ग़लतफ़हमी की बेल लिपट जाती है पैरों से और मैं नहीं जा पाती तुम्हारे करीब बहुत तेज़ होता जाता है झींगुरों का शोर मैं नहीं सुन पाती तुम्हारी धड़कन पैरों में लोटते हैं यादों के सर्प काटने को तत्पर शायद मेरी मृत्यु पर ही निकले तुम्हारे गले से एक चीख और तुम पा जाओ शब्द और जीवन

आइस क्यूब्स

ये झूठ है कि किसी से बिछड़ता है कोई हम बस, मर जाते हैं --------------------------- एयरटेल कहता है हमारी दुनिया में आप कभी अपनों से कभी जुदा नहीं होते ऐसा वादा खुदा क्यूँ नहीं करता कभी? ---------------------- कहीं से आती कोई हवाएं नहीं बता पाती हैं कि तुम्हारे काँधे से कैसी खुशबू आती है? -------------------- किसी भी पहर तुम्हारी आवाज़ नहीं भर सकती है  मुझे अपनी बांहों में!  ------------------------ मैं वाकई नहीं सोचती  लिप बाम लगाते हुए कि तुम्हारे होटों का स्वाद कैसा है! ---------------------------- मुझे कभी मत बताना कितनी आइस क्यूब डालते हो तुम अपनी विस्की में ----------------------------- कच्ची डाली से मत तोड़ा करो मेरी नींदें इनपर ख्वाब का फूल नहीं खिलता फिर ----------------------------- बातों का कैसे ऐतबार कर लूं तुम न कहते हो मुझसे झूठ झूठ  'आई लव यू'. --------------------------- सच कहती हैं सिर्फ उँगलियाँ जो तुम्हारा फ़ोन कॉल पिक करते हु...

जैसे कोई किनारा देता हो सहारा...

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तुमसे जितना झगड़ती हूँ प्यार उतना ही बढ़ता जाता है... रोती हूँ तो सपने धुल के नये से हो जाते हैं.. कुछ और चमकीले... तुम्हारे साथ हँसती हूँ तो उन सपनों में इन्द्रधनुषी रँग भर जाते हैं... तुम्हें हँसता देखती हूँ तो उनमें जान आ जाती है... हम तीनों मिल कर जी उठते हैं फिर से... तुम.. मैं और हमारे सपने...! तुम्हारी मुस्कुराहट को पेंट करने का दिल करता है कभी कभी... काँच सी पारदर्शी तुम्हारी आँखें... उतना चमकदार रँग बना ही नहीं जो उन्हें कैनवस पे उतार सके... कभी कभी सोचती हूँ तुम्हारी रूह को एक काला टीका लगा दूँ... कहाँ बची हैं अब इतनी पाकीज़ा रूहें धरती पर... कहाँ रह गये हैं इतने साफ़ दिल इंसान... मैं बूढ़ी होना चाहती हूँ तुम्हारे साथ... तुम्हें देखते हुए... तुमसे झगड़ते हुए... तुम्हें प्यार करते हुए.... उम्र के उस पड़ाव पर जब घुटनों में दर्द रहा करेगा... तुम्हारे गले में बाहें डाल मैं थिरकना चाहती हूँ तुम्हारी धड़कनों की सिम्फनी पे... मैं उड़ना चाहती हूँ तुम्हारे साथ तुम्हारा हाथ पकड़ के... तब जब ये दुनिया वाले शायद हमें शक की निगाहों से ना देखें... मैं पूरी दुनिया घूमना चाहती हूँ तुम्हारे साथ... व...

उसने लिखा फरेब तो मैंने वफा लिखा

उसने लिखा फरेब तो मैंने वफा लिखा पूरे सफे पे एक नहीं, सौ दफा लिखा मेरे कसूर का पता खुद ही मुझे नहीं उसने ही बार बार कलम से खफा लिखा ... मैंने भी रंज सारा झटके में रख दिया बरसों की मोहब्बत का है ये तोहफा लिखा उसने लिखा नुकसान के रिश्ते का सब सबब रिश्ते के इस हिसाब में मैंने नफा लिखा रखी नहीं कसर कुछ पर वो नहीं माना फिर मैंने भी आखिर में सब कुछ रफा लिखा...

(The Night I felt all alone)

Complicated Relationship is the relatiobship that change the entire meaning of being having a happy realtionship.... Love never end...a universal truth...there is never to late if the mattr is fr love... Here is a hourt touching tale ...inbound emotions and the jist of a upcoming novel (The Night I felt all alone) *COMPLICATED Relationship** *The night I felt all alone** Must read the full post  here http://www.sankz.com/2014/04/complicated-relationship-night-i-felt.html?m=1 **"Love, a word which brings smile, in any of the relationship you are, A single word which entangle in the web series of emotions and trust which is just build by the understanding which the two heart possess"*

प्यार की ये चिट्ठी तुम्हारे नाम

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बहुत कुछ है जो तुमसे कहने का दिल हो रहा है... क्या ये नहीं मालूम... पर कुछ तो है... कितने ही शब्द लिखे मिटाये सुबह से... कोई भी वो एहसास बयां नहीं कर पा रहा जो मैं कहना चाहती हूँ... गोया सारे अल्फ़ाज़ गूंगे हो गए हैं आज... बेमानी... तुम सुन पा रहे हो क्या वो सब जो मैं कहना चाहती हूँ ? ऐसी ही किसी तारीख़ को ऐसे ही किसी प्यारे दिन की याद में ये लिखा था कभी... तुम्हारे लिए... आज भेज ही देती हूँ प्यार की ये चिट्ठी तुम्हारे नाम... *एक दूजे को देख कर जब मुस्कुरायीं थी आँखें पहली बार लम्हें का इक क़तरा थम गया था ! वो ख़ुशनुमा क़तरा आज भी बसा है ज़हन में वो पहली बार जब थामा था तुम्हारा हाथ मेरी उँगलियों ने बींध लिया था तुम्हारी उँगलियों का लम्स भी वो लम्स अब भी महकता है मेरे हाथों में उस आधे चाँद की मद्धम चाँदनी उम्मीद के कच्चे दिए की लौ सी टिमटिमाती हुई आज भी आबाद है दिल के अँधेरे कोने में कहीं सागर की उन बांवरी लहरों ने बाँध के मेरे पैरों को रोका हुआ है वहीं हमारे पैरों के निशां संजो रखे हैं साहिल की गीली रेत ने अब तलक जी करता है ठ...

Ye ankho ki boli

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Kitna asaan ho jata jina Jo tum ankho boli samaj paate Na me kuch keh pati Na tum kuch sun paate Bin kahe sab jaan paate Kanpte labo pe na zor padta Kaano me na chubhte kante Jo tum pad lete meri ankhe Na koi sawal hota na javab ki saugate Dil k raz fir raz na rehte jo tum nazar uthate Or pad paate meri ankhe

मुझे/तुम्हें वहीं ठहर जाना था

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कसम से तुम्हारी बहुत याद आती है, जितना तुम समझते हो और जितना मैं तुमसे छिपाती हूँ उससे कहीं ज्यादा. मैं अक्सर तुम्हारे चेहरे की लकीरों को तुम्हारे सफहों से मिला कर देखती हूँ कि तुम मुझसे कितने शब्दों का झूठ बोल रहे हो...तुम्हें अभी तमीज से झूठ बोलना नहीं आया. तुम उदास होते हो तो तुम्हारे शब्द डगर-मगर चलते हैं. तुम जब नशा करते हो तो तुम्हारे लिखने में हिज्जे की गलतियाँ बढ़ जाती हैं...मैं तुम्हारे ख़त खोल कर पढ़ती हूँ तो शाम खिलखिलाने लगती है. वो दिन बहुत अच्छे हुआ करते थे जब ये अजनबीपन की बाड़ हमारे बीच नहीं उगी थी...इसके जंग लगे लोहे के कांटे हमारी बातों के तार नहीं काटा करते थे उन दिनों. ठंढ के मौसम में गर्म कप कॉफ़ी के इर्द गिर्द तुम्हारे किस्से और तुम्हारी दिल खोल कर हंसी गयी हँसी भी हुआ करती थी. लैम्पोस्ट पर लम्बी होती परछाईयाँ शाम के साथ हमारे किस्सों का भी इंतज़ार किया करती थी. तुम्हें भी मालूम होता था कि मेरे आने का वक़्त कौन सा है. किसी को यूँ आदत लगा देना बहुत बुरी बात है, मैं यूँ तो वक़्त की एकदम पाबंद नहीं हूँ पर कुछ लोगों के साथ इत्तिफाक ऐसा रहा कि उन्हें मेरा ...

tasveer

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bas ek khamoshi hi dil tod jaati hai baki to har baat acchi hai uski tasveer me  

आधी अधूरी बरबादी में जीने से तो बेहतर होता.

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हम मिले होते तो कितना अच्छा होता  तुम मुझे बरबाद करते और मैं तुमको  आधी अधूरी बरबादी में जीने से तो बेहतर होता.

लच्छेदार बातें

मैं जब भी तुम्हे याद करती हूँ, तब ढेर सी लच्छेदार बातें , और बहुत से किस्से याद आते हैं, तुम्हारी वो गर्म-गर्म साँसे जो हौले से मेरे चेहरे  पे लि ख जाती थी तुम्हारा नाम माँ के संग बैठ कर तकिये पर सर टीकाकार तुम्हारा छुप-छुपकर मुझे तिरछी नजरों से देखना इशारे करना गर्म चाय के प्याले को फूंक-फूंककर ठंडा करते वक़्त पापा से  छुपकर , मुझको प्यार से दिया गया तुम्हारा वो पहला फ्लाईंग किस डायरी से उड़ निकलने को बेताब इक खाली पन्ना और वो तुम्हारी लिखी हुई अधूरी कविता  ! वोह किताबों में सूखता हुआ गुलाब का  फूल जो तुमने मुझे वेलेंटाइन डे से पहले दिया था प्यार का  कहकर , बेहद पुरानी डायरी  में रखी हुई हमारी तस्वीर जिसके पीछे तुमने लिखा था फोरेवर योर्स !|♥♥ ओजस्विनी "तरु"

Mere hisse ki zami

तुमने बांटी थी  मेरे हिस्से  ज़मीं  मैंने तेरे हिस्से के आकाश को सलामत रखा  तू  लम्हा दर लम्हा  तोड़ता रहा  मैंने दरकते तेरे रिश्ते को जोड़ती रही  हर पल हर सू  तुही दिखा मुझको  और तेरी नज़र मेरे सामने मुझे  ढूडती रही  :- ओजस्विनी'तरु'
एक दौर से गुजरी तो ये महसूस किया कभी कभी ज़िन्दगी कितनी बदरंग  सी बहार  सजी हुई होती है दुल्हन की तरह ... कभी कभी मोहब्बत करने से और निभाने से भी जद कठिन होता है उसे छुपा के रखना ....किसी शक्ष से जब बेइम्तिहान मोहब्बत होती है और उसी शक्श से हम बात नहीं करना चाहते मालूम होता है दर्दनाक कुछ हुआ होगा ....कैसे खुश हो जाते है ये लैब खिलखिला के जब आँखों के कोरो में नमी छलकती होगी ......कोई हस्ती आँखों का दर्द बयां करे तो जाने हम के मोहब्बत वो शे है जो एक बार हो गयी तो हो गयी ..... कभी कही पड़ा था हमने के मोहब्बत दीवानगी की हद से गुज़र कर रूह में बस्ती है तो जूनून हो जाती है ..... पर अगर वाही मोहब्बत हदों को पर कर जिस्मो से लिपटे तो शर्मशार हो जाती है....बहुत कुछ सोचा ,...सिख भी तो…. इश्क के काफिले बहुत सुने है आज कल जो कल से आज के अलग अलग पैगाम देते है ... हमे तो नफरत भी मोहब्बत हबी नज़र आती है .....पांव ऊपर किये सर के बल कड़ी मोहब्बत ही नफरत है ..प्यार का उल्टा भाव ......आज कल नफरत की भावना से तरवोर हु .....कल तक खुद से नफरत किये बेठी थी ...

एक सुनहरी शाम

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एक सुनहरी शाम रोज़ मिलती है मुझे पिली चुनर लपेटे हुए .....हर रोज़ उससे बतियाना जैसे आदत सी हो गयी है मेरी ..... मेरे गाँव से शहर तक एक रास्ता जाता है .....मुझे भी रोज़ जाना पड़ता है उस रस्ते पर…शाम ढलते ही में लौट भी आती हु .....थके हारे परिंदे की तरह ......आते हुए बहुत लोग मिलते है उस रस्ते पर ..... मुझे मिलती है तरक्की जो मेरे गाँव को धीरे धीरे शहर में तब्दील कर देगी ...अभी वो पहुची नहीं है मेरे गाँव तक… काछे मकानों के बीचो बिच से होक पक्की सड़क है .... आज भी लिपे हुए आंगन मिलते है मुझे रोज़ रस्ते में ..... चार पहिये की गाडिया भी मिलती है मुझे ....मुझे एहसास होता है कभी कभी ......मेरे बड़े से गाँव  में भी छोटा सा शहर पैदा होने लगा है  ..... पर फिर भी मेरा गाँव आज भी खुबसूरत है,खेतो से मुझे आज भी महक आती है मेहनत के पसीने की,खून सा बहा पसीना आज भी लहलहाता है मेरे गाँव में दिलशाद सा। देखो  ज़रा शहर पल रहा है आज भी गाँव की गोद में,फलता फूलता,गाँव समेटे है शहर को अपनी गोद में,बच्चे सा जिद्दी शहर,छोटा शहर, बड़ा सा गाँव नदी की लहर . .

man ko ghere hue

fir uthi hai peer dil me phir se man bhari hua hai phir se teri baate chidi hai phir se yade man ko ghere hue hai kitna ashaay si hu kitni bebas si hu tumhare chale jane ke dar se me kitni tanha si hu

उस मोड़ से शुरू करें फिर ये ज़िन्दगी...

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Your Cheerful Looks Makes Day A Delight ! आज पलट के बीते सालों पे नज़र डालती हूँ तो यकीन नहीं होता... ये उसी लड़की के लिए कहा गया था कभी जो आज अपनों के लिए दुःख और उदासी का कारण बनी हुई है... ये टाइटल ऐसे ही नहीं दिया गया था उसे क्लास ट्वेल्फ्थ की फेयरवेल पार्टी में... उसकी खुशमिज़ाजी ने उसे स्कूल कॉलेज, यार दोस्तों के बीच एक अलग पहचान दी हुई थी... बड़ी से बड़ी परेशानी में भी हमेशा ख़ुश और हँसती रहने वाली लड़की... वो कभी हर महफिल की जान हुआ करती थी जो आज ख़ुद से भी इतना कटी कटी रहती है... ख़ुद से ही नाराज़... कब वो इतना बदल गयी... उसकी वो हँसी कहाँ गायब हो गयी उसे भी कहाँ पता चला था... बहुत चिड़चिड़ी हो गई थी वो... बात बात पे गुस्सा करने लगी थी... नाराज़ रहने लगी थी... लोग अक्सर उससे शिकायत करने लगे थे उसके स्वभाव को ले कर... पर जो लोग उसे अभी-अभी मिले थे वो उसे जानते ही कितना थे... वो हर किसी की शिकायत सुनती और चिढ़ जाती... एक अजीब सी खीझ भरती जा रही थी उसके मन में सबके प्रति... एक बेहद गहरी ख़ामोशी उसे घेरती जा रही थी जो सिर्...