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tasveer

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bas ek khamoshi hi dil tod jaati hai baki to har baat acchi hai uski tasveer me  

एक सुनहरी शाम

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एक सुनहरी शाम रोज़ मिलती है मुझे पिली चुनर लपेटे हुए .....हर रोज़ उससे बतियाना जैसे आदत सी हो गयी है मेरी ..... मेरे गाँव से शहर तक एक रास्ता जाता है .....मुझे भी रोज़ जाना पड़ता है उस रस्ते पर…शाम ढलते ही में लौट भी आती हु .....थके हारे परिंदे की तरह ......आते हुए बहुत लोग मिलते है उस रस्ते पर ..... मुझे मिलती है तरक्की जो मेरे गाँव को धीरे धीरे शहर में तब्दील कर देगी ...अभी वो पहुची नहीं है मेरे गाँव तक… काछे मकानों के बीचो बिच से होक पक्की सड़क है .... आज भी लिपे हुए आंगन मिलते है मुझे रोज़ रस्ते में ..... चार पहिये की गाडिया भी मिलती है मुझे ....मुझे एहसास होता है कभी कभी ......मेरे बड़े से गाँव  में भी छोटा सा शहर पैदा होने लगा है  ..... पर फिर भी मेरा गाँव आज भी खुबसूरत है,खेतो से मुझे आज भी महक आती है मेहनत के पसीने की,खून सा बहा पसीना आज भी लहलहाता है मेरे गाँव में दिलशाद सा। देखो  ज़रा शहर पल रहा है आज भी गाँव की गोद में,फलता फूलता,गाँव समेटे है शहर को अपनी गोद में,बच्चे सा जिद्दी शहर,छोटा शहर, बड़ा सा गाँव नदी की लहर . .