एक दौर से गुजरी तो ये महसूस किया कभी कभी ज़िन्दगी कितनी बदरंग सी बहार सजी हुई होती है दुल्हन की तरह ... कभी कभी मोहब्बत करने से और निभाने से भी जद कठिन होता है उसे छुपा के रखना ....किसी शक्ष से जब बेइम्तिहान मोहब्बत होती है और उसी शक्श से हम बात नहीं करना चाहते मालूम होता है दर्दनाक कुछ हुआ होगा ....कैसे खुश हो जाते है ये लैब खिलखिला के जब आँखों के कोरो में नमी छलकती होगी ......कोई हस्ती आँखों का दर्द बयां करे तो जाने हम के मोहब्बत वो शे है जो एक बार हो गयी तो हो गयी ..... कभी कही पड़ा था हमने के मोहब्बत दीवानगी की हद से गुज़र कर रूह में बस्ती है तो जूनून हो जाती है ..... पर अगर वाही मोहब्बत हदों को पर कर जिस्मो से लिपटे तो शर्मशार हो जाती है....बहुत कुछ सोचा ,...सिख भी तो…. इश्क के काफिले बहुत सुने है आज कल जो कल से आज के अलग अलग पैगाम देते है ... हमे तो नफरत भी मोहब्बत हबी नज़र आती है .....पांव ऊपर किये सर के बल कड़ी मोहब्बत ही नफरत है ..प्यार का उल्टा भाव ......आज कल नफरत की भावना से तरवोर हु .....कल तक खुद से नफरत किये बेठी थी ...
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एक सुनहरी शाम
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एक सुनहरी शाम रोज़ मिलती है मुझे पिली चुनर लपेटे हुए .....हर रोज़ उससे बतियाना जैसे आदत सी हो गयी है मेरी ..... मेरे गाँव से शहर तक एक रास्ता जाता है .....मुझे भी रोज़ जाना पड़ता है उस रस्ते पर…शाम ढलते ही में लौट भी आती हु .....थके हारे परिंदे की तरह ......आते हुए बहुत लोग मिलते है उस रस्ते पर ..... मुझे मिलती है तरक्की जो मेरे गाँव को धीरे धीरे शहर में तब्दील कर देगी ...अभी वो पहुची नहीं है मेरे गाँव तक… काछे मकानों के बीचो बिच से होक पक्की सड़क है .... आज भी लिपे हुए आंगन मिलते है मुझे रोज़ रस्ते में ..... चार पहिये की गाडिया भी मिलती है मुझे ....मुझे एहसास होता है कभी कभी ......मेरे बड़े से गाँव में भी छोटा सा शहर पैदा होने लगा है ..... पर फिर भी मेरा गाँव आज भी खुबसूरत है,खेतो से मुझे आज भी महक आती है मेहनत के पसीने की,खून सा बहा पसीना आज भी लहलहाता है मेरे गाँव में दिलशाद सा। देखो ज़रा शहर पल रहा है आज भी गाँव की गोद में,फलता फूलता,गाँव समेटे है शहर को अपनी गोद में,बच्चे सा जिद्दी शहर,छोटा शहर, बड़ा सा गाँव नदी की लहर . .
उस मोड़ से शुरू करें फिर ये ज़िन्दगी...
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Your Cheerful Looks Makes Day A Delight ! आज पलट के बीते सालों पे नज़र डालती हूँ तो यकीन नहीं होता... ये उसी लड़की के लिए कहा गया था कभी जो आज अपनों के लिए दुःख और उदासी का कारण बनी हुई है... ये टाइटल ऐसे ही नहीं दिया गया था उसे क्लास ट्वेल्फ्थ की फेयरवेल पार्टी में... उसकी खुशमिज़ाजी ने उसे स्कूल कॉलेज, यार दोस्तों के बीच एक अलग पहचान दी हुई थी... बड़ी से बड़ी परेशानी में भी हमेशा ख़ुश और हँसती रहने वाली लड़की... वो कभी हर महफिल की जान हुआ करती थी जो आज ख़ुद से भी इतना कटी कटी रहती है... ख़ुद से ही नाराज़... कब वो इतना बदल गयी... उसकी वो हँसी कहाँ गायब हो गयी उसे भी कहाँ पता चला था... बहुत चिड़चिड़ी हो गई थी वो... बात बात पे गुस्सा करने लगी थी... नाराज़ रहने लगी थी... लोग अक्सर उससे शिकायत करने लगे थे उसके स्वभाव को ले कर... पर जो लोग उसे अभी-अभी मिले थे वो उसे जानते ही कितना थे... वो हर किसी की शिकायत सुनती और चिढ़ जाती... एक अजीब सी खीझ भरती जा रही थी उसके मन में सबके प्रति... एक बेहद गहरी ख़ामोशी उसे घेरती जा रही थी जो सिर्...
आखिर वो चाहता क्या है .....
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आखिर वो चाहता क्या है ....कहता है मुझसे प्यार करता है और मेरा दिल दुखाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ता है ..... अभी कल की ही तो बात थी ...उसने कहा था कुछ भी पहन के आजाना ..मैंने पूछा भी था ' क्या पहन कर आऊ में ' कुछ भी पहन कर आजाना उसने यही कहा था जो तुमको अच्छा लगे ..... कितनी खुश थी में के मुझे देख के उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहेगा ....मुझे देखते ही मुजको अपने गले से लगा लेगा वो ...प्यार जो करता है मुझसे ..... खिड़की से देखा था मैंने ...और बैग उठा कर अपने हाथो में रख लिय।वो बेठने को पूछता उससे पहले ही मैंने उसके लिए जगह कर दी थी सीट पर बस में ..... वो आके बैठ गया उसकी एक नज़र मुझपर थी दूसरी मेरे कपड़ो पर। अपने कानो में मोबाइल का हेड फ़ोन लगा लिया और एक कान से निकल दिया ..मेरी बात सुनने को शायद नहीं लगाया था .... क्या हुआ ...ऐसे क्यों बेठे हो मुह फुला कर मैंने पूछा था ...वो कुछ नहीं बोला ...मेरे अरमानो पर जैसे को कटाक्ष वार कर रहा हो .... उसकी चुप्पी चुभ रही थी मुझे पर वो कुछ नहीं बोल......बस से उतरे और कॉलेज में घुसने तक उसने कुछ न कहा ..अन्दर पहुचते ही मेरे गले से स्कार्फ ख...
एक शाम कुछ यूँ हुआ
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एक शाम कुछ यूँ हुआकायनात उलट सी गई,फलक समंदर में तब्दील होने लगा बादल लहरों के माफिक दौड़ -दौड़ साहिल तलाशने लगे ज्वार-भाटे के गर्जन ..... आकाश में गश्त करने लगे धरती की कश्ती में सिक्का फेंक सूरज लुटने ही वाला था के चाँद ने आकर बाजी पलट दी (ना जाने कितनो की बालाएं अपने सर लेगा ये चाँद) आसमां ठहर गया सागर नहीं बना, धरती भी अपनी जगह कायम पाताल होने से बच गई अब के बार कुदरती प्यादों ने कोई साजिश की तो कसम से ! ए खुदा सुन ! क़यामत तेरे घर होगी समझा दे अपनी कुदरत को हम खुदाबन्द .. इन्साफपरस्त लोग हैं अदालत ज़मी पे बैठेगी पेशी भी यहीं पड़ेगी सिर्फ तारीखे मिलेंगी लगाना फिर चक्कर पे चक्कर बहरहाल ! केस फाइल नहीं किया है मामला मुल्तवी हुआ... बर्खास्त नहींऑन रिकॉर्ड ना सही ऑफ रिकॉर्ड है एक और बात - सिर्फ तुम ही नहीं रखते बही खाता फाइल री-ओपन यहाँ भी होती हैं और सेटेलमेंट भी करो अब चुनाव क्या चाहते हो ?